Friday, November 16, 2012

दो और दो तीन

भारत में ऐसे ही मनती है दीवाली। सप्ताह-भर तक तैयारियां, फिर एक रात का ज़बरदस्त जश्न। आकाश में तारे धरती से भेजे जाते हैं उस रात। अंधियार से दिया लड़ता है। खामोशी से पंगा लेता है शोर। और फीकेपन को हराती है मिठाई। सोने-चांदी के बंदनवार सजते हैं, लक्ष्मी के लिए।
लेकिन ये सब तो हो चुका। अब तो आगे की कहानी की बारी है।
एक अखबार लिखता है कि  एक-एक शहर में अरबों के पटाखे बिके। दूसरा लिखता है कि कपड़ों की बिक्री हज़ारों करोड़ की। तीसरे की घोषणा होती है कि  करोड़ों के बर्तन देखते-देखते बिक गए। चौथा कहता है सोना-चांदी ने शताब्दी का सबसे बड़ा उछाल लिया। मिठाई ने ऐसा रिकार्ड तोड़ा,कि घी-दूध के समंदर खप गए। खबरी चैनल भी पीछे नहीं रहते, कहते हैं, जितने सूखे-मेवे पैदा हुए थे, उससे दो गुना ज्यादा बिक गए। साल-भर में जितनी बिजली का उत्पादन होता है,उससे डेढ़ गुनी इस रात जल गई।
फिर बारी आती है, आम आदमी की। वह कागज़ और पेन्सिल निकाल कर बैठता है और जोड़ने लगता है सब ख़बरों के आंकड़े। उसे लगता है कि  अब शहर, शहर नहीं रहे, बल्कि परीलोक हो गए।
और अगले दिन जब घर-घर गोवर्धन की पूजा हो रही होती है, तब आता है उसे पिछले दिन के गुड़ और अगले दिन के गोबर का स्वाद एक साथ।
नगर-पालिका कहती है कि  दीवाली ने इतना कचरा कर दिया कि  अब साल भर तक उठाने वाले नहीं मिलेंगे। बिजली विभाग कहता है, शहरों में रात का और गाँवों में दिन का ब्लैक-आउट। हस्पताल कहते हैं, मधुमेह रोगियों के लिए बिस्तर खाली नहीं। बारूद के सौदागार कहते हैं, बस, अब बाकी बची बारूद धमाकों में काम आएगी। लक्ष्मी कोरियर से स्विट्ज़रलैंड। 
और बेचारा आम-आदमी कहता है- दो और दो तीन!    

2 comments:

  1. बेचारा आम आदमी, गनीमत यह है की पर्वों पर राशनिंग नहीं हुई है अभी, साल में ६ पर्व बस!

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  2. Deewali Mubarak. Kuchh din ki baat hai, fir parv hi parv bhi aane vaale hain. Paanch saal beetne men thoda hi samay hai.

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