Saturday, May 31, 2014

जो किसी के काम आएगा, उसी का सम्मान होगा।

वह एक भव्य और शानदार रिहायशी बिल्डिंग थी।  पिछले कई महीनों से सैंकड़ों कारीगरों ने मिल कर उसे तैयार किया था।  नयनाभिराम रंगों से उसकी साज-सज्जा की गयी थी।  अब तो लोगों से बस भी गयी थी वह।
उसी के मुख्य द्वार के पास लगे एक पेड़ पर हरा-सुनहरा टिड्डा पत्तियों में छिपा बैठा था।  वह लगातार दीवार के एक छज्जे के नीचे चिपकी छिपकली को ललचाई नज़रों से देख रहा था। छिपकली की  निग़ाह उस पर पड़ी तो वहीँ से चिल्ला कर बोल पड़ी-
-"ए, क्या हुआ? ऐसे क्या देख रहा है?"
-"सुन, तू वहाँ कैसे पहुंची? मुझे तो ये दरबान आने ही नहीं देता, देखते ही उड़ा देता है।" टिड्डा बोला।
छिपकली ने कहा- "तू यहाँ आकर करेगा क्या ? मैं तो छोटे-छोटे कीटों को खाकर दीवारों की सफाई करती हूँ, तू अहाते में खेल रहे बच्चों को ही काटेगा, क्यों आने दे वॉचमेन तुझे?"
टिड्डा अपना सा मुंह लेकर रह गया।
दोपहर को घूमती-घूमती छिपकली ही पेड़ की ओर चली आई। उसने टिड्डे को पूरी दास्तान सुनाई- "मैं भी कभी तेरी तरह यहाँ नई-नई आई थी। तब भवन पूरा बना भी नहीं था। इसी पेड़ के नीचे एक मजदूरनी अपने बच्चे को सुला कर काम पर भीतर जाती थी।  मैं उसके बच्चे की हिफ़ाज़त चीटियों से करती थी।  किसी चीटीं को उसके पास फटकने तक नहीं देती थी। बिल्डिंग पूरी होने पर वही मुझे अपनी गठरी में बैठा कर भीतर छोड़ गई। तभी से मैं यहाँ हूँ। तुझे यदि यहाँ रहना है तो किसी के काम आ।"
                       

Friday, May 30, 2014

बच्चे किताबों में जीवित लोगों के बारे में क्यों न पढ़ें ?

यह बात शत-प्रतिशत सही है कि बच्चों के कोर्स की किताबों में उन लोगों की उपलब्धियों को नहीं डाला जाना   चाहिए, जो जीवित हैं, और अब भी सक्रिय हैं।  इसके कई कारण हैं-
१. बच्चा तो कोर्स पढ़ कर आगे निकल जाएगा, पर उस व्यक्ति की उपलब्धियाँ आगे और भी बढ़ सकती हैं, जबकि बच्चे के दिमाग में अंतिम रूप से उसकी वही छवि अंकित हो जायेगी।
२. हो सकता है कालांतर में वह व्यक्ति कर्तव्यविमुख होकर अपनी छवि के विपरीत कार्य कर बैठे।
३. सब चाहते हैं कि वे इतिहास में दर्ज़ हों, वर्तमान में नहीं !
४. ये एक ऐसा क्यू है जिसमें सब लगना चाहते हैं, किन्तु व्यक्ति एक बार दिवंगत हो जाने के बाद क्यू में बार-बार नहीं लग सकेगा।
५. जीवित व्यक्ति अपनी छवि के निर्माण या छवि के परिवर्तन हेतु अवांछित दबाव बना सकता है।
६. लोग जीवित व्यक्ति की अच्छाइयों को भी जल्दी से स्वीकार नहीं करते।
७. लोग दिवंगत व्यक्ति की कमियों को सहजता से अनदेखा कर देते हैं।       
  

Thursday, May 29, 2014

नई पीढ़ी साहित्य से दूर क्यों होती जा रही है?

ये बड़ी चौंकाने वाली बात थी।  ऐसा तो कभी नहीं होता था।  वह बहुत ज़्यादा देर से तो नहीं आई है, इस से भी ज़्यादा देर तो उसे पहले भी कई बार हुई है। फिर ये आज रोहित को क्या हो गया? ये इस  तरह मुँह लटका कर क्यों बैठा है? केवल पलक के थोड़ा देर से आने पर इतनी नाराज़गी? रोहित जानता है न पलक का कॉलेज यहाँ से कितनी दूर है, फिर समय तो लगेगा ही न ? यही क्या कम है कि कॉलेज के बाद वह रोहित से मिलने सेंट्रल पार्क में चली आती है। रोहित के पास तो अपनी बाइक भी है, उसे तो बस से ही आना पड़ता है।वैसे रोहित कई बार कहता है कि वह उसे कॉलेज से ही पिक कर लेगा, पर वही मना कर देती है।  उसे डर रहता है कि वहां रोहित को पलक की कोई फ्रेंड देख लेगी, तो बेकार तिल का ताड़ बना देगी।  दूसरे,वह रोहित को थोड़ा इंतज़ार भी तो कराना चाहती है।  ज़रा वह भी तो देखे कि जनाब कितने पानी में हैं?
पलक ने रोहित को उदास बैठे देखा तो गुस्से की जगह पहले थोड़े प्यार से काम लिया।  उसे बताया कि पलक को देर क्यों हुई। लेकिन इस से भी बड़ा अचम्भा तो पलक को यह जान कर हुआ कि रोहित उसके देर से आने के कारण नाराज़ नहीं है, बल्कि उसकी उदासी तो किसी और बात को लेकर है।
अब तो पलक हाथ धोकर उसके पीछे पड़ गई।  उसे कसम दे दी कि अपनी उदासी की वजह बताये।
पलक जानती थी कि इंजीनियरिंग के छात्र रोहित को साहित्य में कोई दिलचस्पी नहीं थी।  लेकिन फिर भी वह आज संयोग से लायब्रेरी चला गया और वहां उसने एक नामचीन कवि की मशहूर किताब पढ़ डाली।  किताब को पढ़ कर उसे पता चला कि आदम और हव्वा दुनिया के पहले स्त्री-पुरुष हैं, और बाकी सब उन्हीं की संतान।
-"तो इसमें उदास होने की क्या बात ?" पलक को अचरज हुआ।
-"तो हम सब भाई-बहन नहीं हुए?" रोहित ने मायूसी से कहा।                          

Wednesday, May 28, 2014

क्या आपको पता है कि रस्बी किस देश की नागरिक थी?

उसका जन्म भारत में हुआ।  क्योंकि उसकी माँ जेल में थी, और उसे माँ के साथ जेल में ही रहना पड़ रहा था, एक एनजीओ की मदद से वह अरब के एक परिवार द्वारा गोद ले ली गई। वहां सोमालिया के एक युवक से उसे प्रेम हुआ और उसका विवाह हो गया।  युवक अमेरिकी सेना में सम्मिलित होकर अमेरिका में ही बस गया।
अपने बेटे को पानी में बहते देख कर रस्बी ने जिस जलधारा में छलाँग लगा कर अपनी इहलीला समाप्त कर ली, वो जलधारा भी दो मुल्कों के बीच से होकर बह रही थी। इधर अमेरिका और उधर कनाडा!
उसे माँ भारत में,पिता अरब में,पति सोमालिया में, और पुत्र अमेरिका में मिला !
रस्बी खुद कहाँ की थी?
यदि आपके पास इस प्रश्न का उत्तर हो तो ज़रूर बताएं, मेरे पास तो एक ही उत्तर है-"जल तू जलाल तू" 
         

क्या आप जानते हैं कि ज़िंदगी में बड़े बदलाव किस उम्र में आते हैं?

वैसे तो ज़िंदगी हर घड़ी ही रूप बदलती है, किन्तु फिर भी इंसान की ज़िंदगी के चंद पड़ाव बदलाव की दृष्टि से ख़ासे अहम होते हैं।  इन लम्हों में हम अपने अंतरतम तक बदलाव से गुज़रते हैं।
लगभग सौ दिन[100] का बच्चा पहली बार इस अहसास से दो-चार होता है कि यदि कुछ चाहिए, तो इशारा करो।
लगभग सात[7] महीने के बच्चे में यह समझ विकसित होनी शुरू होती है कि नज़र आने वाले सभी अपने नहीं हैं। लगभग दो[2] साल का बच्चा यह समझने लगता है कि  माँ अपने साथ पक्षपाती है।
चार[4] साल का बच्चा ये सबक़ सीख जाता है कि अपने हितों का बचाव करना है।
ग्यारहवाँ[11] साल बच्चे को यह आश्वस्ति दे देता है कि  यदि माँ-बाप उसके अपने बराबर भाव किसी और को दे रहे हैं तो यह मात्र शिष्टाचार है।
सत्रहवाँ[17] साल मन में यह सतर्कता जगा देता है कि कोई देख रहा है।
बाइसवाँ[22] साल यह अहसास जगाता है कि फैसले अपने ही होने चाहिए।
उन्तीसवाँ[29] साल मन पर दबाव बनाता है कि चीज़ें अब साफ़ हो ही जानी चाहिए।
चौतीसवाँ[34] और बयालीसवाँ[42] साल प्रेरित करता है कि कुछ जोड़ना चाहिए।
छप्पनवाँ[56] साल बचपन में पढ़ी रेखागणित और शिद्दत से याद दिलाता है।  कोण,वृत्त,पैराबोला ,ग्राफ़ मन में दोहराये जाते हैं।
त्रेसठवां[63] साल स्वाद पकड़ के रखना सिखाता है।
चौहत्तरवाँ[74] साल चलते समय आस-पास की दीवारों को देखने की आदत बना देता है।
इक्यासीवाँ[81] साल मन में भीरुता को प्रश्रय देता है।
नब्भेवें [90] साल में हंसी खुल जाती है।
चौरानवे[94] साल के आदमी का मन आशीष देने को मचलता है।
निन्यानवे[99] साल के व्यक्ति की भृकुटियाँ तन जाती हैं।
याद रखें, हमें गढ़ते समय विधाता "जितने बनाने हैं उतने साँचे" लेकर बैठता है।       

Tuesday, May 27, 2014

स्पीकिंग बॉक्सेज़ अर्थात बोलते डिब्बे

बरसों तक एकांत में अकेले मेहनत करते हुए एक वैज्ञानिक ने अपने अनुसन्धान से एक ऐसा यन्त्र बना लिया, जिसे यदि किसी भी वस्तु पर चिपका दिया जाये तो वह बोलने लगती थी।
अपनी खोज से संतुष्ट होकर वैज्ञानिक बैठा सोचने लगा कि इसे कहाँ लगा कर प्रयोग किया जाए।
उसने कुछ दूरी पर एक खेत पर काम करते हुए कुछ लोग देखे, वह उसी ओर  बढ़ चला।
वहां जाकर उसने देखा, एक शानदार फार्महाउस के सामने पेड़ की छाँव में बिछे तख़्त पर खेत का मालिक बैठा हुक्का गुड़गुड़ा रहा है।  और सामने कुछ दूरी पर तेज़ धूप की गर्मी में दो लड़के पसीना बहाते हुए काम में जुटे हैं। वैज्ञानिक कुछ दूरी पर खेत के किनारे खड़ा होकर नज़ारा देखने लगा।  उसने खेत के मालिक को, और काम करते लड़कों ने उसे, दूर से इशारों में ही अभिवादन भी किया।
कुछ देर बाद मालिक ने कहा- "अरे चलो, खाने का समय हो गया है, खाना खालो।"
संयोग देखिये, कि जिस पेड़ के नीचे वैज्ञानिक इतनी देर से खड़ा था, उसी पर खाने के दो टिफ़िन बॉक्स टंगे थे। मालिक की बात सुनते ही वैज्ञानिक ने दोनों बॉक्स पेड़ से उतारे और आगे बढ़ कर एक मालिक को और दूसरा उन दोनों लड़कों को पकड़ा दिया।  सभी कृतज्ञता से वैज्ञानिक की ओर  देखने लगे।
मालिक ने तख़्त पर एक ओर खिसकते हुए वैज्ञानिक से कहा- "आइये महाशय, आप भी मेरे साथ भोजन कीजिये।"
मालिक ने खाते-खाते वैज्ञानिक से सवाल किया- "एक बात बताइये महाशय, ये दोनों बॉक्स बाहर से देखने में बिलकुल एक से  हैं, वज़न भी बराबर है, फिरभी आपने बिलकुल ठीक कैसे पहचान लिया कि कौन सा मेरा है, और कौन सा मेरे श्रमिकों का, जबकि अंदर इनमें अलग-अलग किस्म का खाना है ?"
वैज्ञानिक ने कहा-"मुझे आपके डिब्बों ने बताया, मैं खड़ा-खड़ा इनकी बातें सुन रहा था। एक बॉक्स कह रहा था-चलो, थोड़ी ही देर में मेरा भोजन तो रक्त-प्राण बन कर रग़ों में बहने वाला है, जबकि दूसरे बॉक्स से आवाज़ आ रही थी- चलो भैया, पेट में बदबूदार लुगदी बन कर सुबह तक पड़े रहना, और लोगों के प्राण पीना।"
मालिक के गले में कौर अटकने सा लगा, वह पानी की बोतल की ओर झुक गया।
                      

Monday, May 26, 2014

"चीटिंग इसे न कहना"

मुर्ग़े मोर बतख ने मिलकर
कर डाली एक मीटिंग
'ऊंची नहीं उड़ान हमारी
ये कुदरत की चीटिंग'

आसमान से एक परिंदा
बोला तभी झांक कर
'चीटिंग' इसे न कहना मित्रो
देखो ज़रा आँक कर

जो जितना ऊपर जाता है
रहता निपट अकेला
नीचे वालों के संग होता
ये दुनिया का मेला

नाचे मोर सदा जंगल में
नभ में कैसे नाचे ?
कुकड़ू कूँ मुर्गे की सुनकर
सारी बस्ती जागे।   


वैसे तो अच्छा नहीं इतिहास में लौटना, लेकिन फिर भी

हमारे अतीत ने और जो बातें हमें सिखाई हैं, वे तो अपनी जगह हैं ही, लेकिन एक महत्वपूर्ण बात ये भी सिखाई है कि डिब्बा-बंद चीज़ें हमेशा अच्छी नहीं होतीं।
डिब्बा बंद चीज़ों से मतलब ये है कि वे भविष्य के लिए डिब्बे में बंद करके रख दी जाती हैं, ताकि ज़रूरत के समय उन्हें निकाल कर काम में लिया जा सके।
इतिहास में डिब्बा-बंद "राजा" भी होते थे।  वे भविष्य में इस्तेमाल किये जाने के लिए रख दिए जाते थे, ताकि ज़रूरत के समय अवाम के द्वारा निकाल कर बरत लिए जायँ। भविष्य के लिए राजा डिब्बे में बंद करने की ज़िम्मेदारी वर्तमान राजा की होती थी।  वह अपने ही पुत्रों में से एक, अमूमन बड़े पुत्र को डिब्बा-बंद कर देता था।  यदि किसी राजा के संतान नहीं होती थी, तो वह समय रहते ही किसी को दत्तक-पुत्र के रूप में अपना कर डिब्बा-बंद कर देता था।  यदि संतान के रूप में पुत्र न होकर केवल पुत्री हो, तब भी ऐसा ही किया जाता था, क्योंकि ऐसा माना जाता था कि पुत्री राजकार्य नहीं चला सकेगी।
लेकिन उस ज़माने में भी यह प्रयोग तीन-चार पीढ़ियों से ज़्यादा नहीं चल पाता था।  क्योंकि हर अगली पीढ़ी के साथ राजा का "तेज" कच्चा पड़ता जाता था। फिर डिब्बा-बंद राजा ताज़ा हवा, अवाम के कोलाहल और नए दौर के चाल -चलन से महरूम भी रह जाता था।        

Friday, May 23, 2014

"शपथ-ग्रहण का खर्चा"

शेर बना जंगल का राजा
शपथ-ग्रहण का फंक्शन
न्यौता भेजा- "कोयल दीदी
आएं  ऑर्केस्ट्रा - संग"


पूछा खर्चा, बोलीं -"देंगे
मेरे लोग गली के
पांच रूपये दे देना तुम तो
'फेयर-एन-लवली' के।"    

"डाइट"

बिल्ली से बोली बकरी-
"एक बात बताना पूसी !
शेर भांजा लम्बा- तगड़ा
तुम मौसी इतनी सी ?"


बिल्ली बोली- "सेहत मेरी
भला बने भी कैसे ?
यहाँ डिनर चूहों का होता
वो  खाता  है  भैंसे !" 

खट्टे अंगूर

कहा शेर ने बड़ा कठिन है
सबसे रखना नाता
चलो फेसबुक पर ही खोलो
अपना-अपना खाता

होकर के मायूस बेचारा
तब बोला लंगूर
"काला अपना फेस", हमारे
तो खट्टे अंगूर।    

खाने के दाँत , दिखाने के दाँत , भींचने के दाँत , पीसने के दाँत

खींच रहे थे हाथी दादा
बाँध पूंछ में इंजन एक
इंजन में भरकर लाए थे
नया दन्त-मंजन वो एक

शेरू बोला- टूथपेस्ट की
क्या दुकान खोलोगे आप
इतना सारा मंजन, दादा
कहाँ काम में लोगे बाप?

बोले दादा- तुझको दिखते
फ़क़त दिखाने वाले दाँत
मुंह में ढेरों और कई हैं
मेरे खाने वाले दाँत।    

जैसा देश वैसा भेष

नया खुला था वो विद्यालय
बिल्ली ने ले लिया प्रवेश
ज़ीन्स पहन कर पढ़ने आई
जैसी नगरी वैसा वेश

लंच हुआ तो सारे बच्चे
दौड़े सरपट आगे-आगे
लंच-बॉक्स बिल्ली ने खोला
निकल-निकल कर चूहे भागे।  

मैं तो भूल ही गया था, उन्होंने ही याद दिलाया

कल घूमने  जाते समय कुछ बच्चे क्रिकेट खेलते हुए मिले।  वे बोले- "अंकल, हमारी छुट्टियाँ शुरू हो गयीं।"
मुझे एकाएक याद आया कि वे ऐसा क्यों कह रहे हैं।
दरअसल छुट्टियों में कुछ दिन के लिए मेरा ब्लॉग बच्चों को समर्पित हो जाता है।  वैसे भी पिछले दिनों थोड़ी एकरसता आ ही गयी थी।  अब नई सरकार को काम शुरू करने देते हैं। रोज़ाना की नुक्ता-चीनी से अच्छा है कि कुछ दिन बाद फ़िज़ा देखें।

"सुबह-सुबह जॉगिंग को निकली
डेयरी से ले आई दूध
बिल्ली ने फिर खीर बनाई
चीनी डाली उसमें खूब

गरम-गरम खाने बैठी थी
छत पर आया मंकी एक
बोला- छत पर बड़ी हवा है
करके ला दूँ ठण्डी प्लेट?"      

Wednesday, May 21, 2014

अब ठीक है

"देश की पहली महिला आई पी एस" अधिकारी होना कोई ऐसी घटना नहीं है, जिसे इतिहास चुपचाप दर्ज़ कर ले।  फिर महिला भी ऐसी कि जिसने अपनी हर पोस्टिंग पर छाप छोड़ी हो।  मुझे हमेशा ऐसा लगता था कि किरण बेदी अपने कैरियर में अभी पूरी नहीं हो गई हैं।
अब खबर है कि वे राजनीति में सक्रिय होकर दिल्ली के भावी-मुख्यमंत्री की दौड़ में ज़ोर-आजमाइश के लिए तैयार हो गई हैं।  यह अच्छा कदम है।
भारत जिस भविष्य की देहलीज़ पर आ खड़ा हुआ है, वहां केवल झाड़ू की नहीं, सफ़ाई की नीयत अहम है, किरणजी ने अपनी हर तैनाती पर दिखाया है कि वे केवल कुशल सरकारी अधिकारी ही नहीं, बेहतर देश की तलबगार भी हैं। वे ऐसी दिल्ली बनायें, जहाँ खड़े होकर मोदीजी भारत का परचम सारी दुनिया में लहरा दें, शुभकामनाएं !    

जैसे सब अपराधी जेल में नहीं होते, वैसे ही जेल में बंद सब लोग अपराधी नहीं होते

 "निष्कर्ष" निकालना एक कला है। यह एक विज्ञान भी है। थोड़ा और आगे चलें, तो यह वाणिज्य भी है, अर्थात व्यापार।यह क़ानून तो है ही, यह पत्रकारिता भी है।
देश में अभी-अभी एक घटना घटी। आम चुनाव हुए, और पिछली सरकार की जगह एक नई सरकार आ गई।सब कुछ गणित की तरह साफ़ है कि किसे कितने वोट मिले, किसे कितनी सीटें मिलीं, फिर भी लोगों के निष्कर्ष अलग-अलग हैं- कोई कह रहा है, अच्छा हुआ, कोई कह रहा है ठीक नहीं हुआ।
आप चाहें तो आप भी कई निष्कर्ष निकाल सकते हैं, जैसे-
-हम जिस रंग का चश्मा पहने बैठे हैं, हमें सब उसी रंग का दिखेगा।
-हमारे पास खूब "रिच" शब्दावली है, हम किसी को भी पूज सकते हैं, किसी को भी कोस सकते हैं।
-हम इंसानों के परिचय-पत्र पर जानवरों की फोटो भी चिपका सकते हैं, उदाहरण के लिए "बाढ़ का पानी आता है तो सांप-बिच्छू एक जगह बैठ जाते हैं-राम विलास पासवान।"
            

Monday, May 19, 2014

मैं, हम और आप

राजाओं का प्रशिक्षण चल रहा था।  उनका कोच उन्हें सुबह-सुबह शहर के सबसे व्यस्त चौराहे पर ले गया, और वहां उसने उधर से गुज़रते सारे दूध वालों को रोक लिया। कोच ने बुलंद आवाज़ में घोषणा की- "कल से यहाँ से गुज़रने वाले उन सभी दूध वालों को गिरफ्तार कर लिया जायेगा, जो दूध में किसी भी तरह की मिलावट करेंगे।"
कोच वहां से चला गया और उसने राजाओं को निर्देश दिया कि वह सभी दूध वालों से यह जानने की कोशिश करें, कि लगभग कितने प्रतिशत ग्वाले इस घोषणा से खुश हैं?
फिर वह एक सरकारी दफ्तर में गए।  वहां कोच ने ऐलान किया-"कल से देर से आने वाले, जल्दी जाने वाले, बीच में ड्यूटी से नदारद रहने वाले कार्मिकों का उतने समय का वेतन काट लिया जायेगा।"
राजाओं को फिर निर्देश दिया गया कि वह इस निर्णय से खुश होने वालों की संख्या पता लगाएं।
तब कोच राजाओं को एक कॉलेज में ले गया।  ऐलान किया कि क्लास में नियमित रूप से न आने वाले और  परीक्षा में नक़ल करने वाले विद्यार्थियों को अगले वर्ष इसी क्लास में रहना होगा।
राजाओं से फिर कहा गया कि वह खुश होने वाले बच्चों की संख्या पता लगाएं।
अंत में कोच एक बाजार में ठहरा और व्यापारियों में घोषणा की-"जो लोग अपना सही और पूरा टैक्स नहीं चुकाएंगे, उनका व्यापार बंद करा दिया जाएगा।"
राजाओं को उन व्यापारियों की संख्या पता लगानी थी जो घोषणा से खुश हुए।
अब कोच ने राजाओं से पूछा-"आपने अभी तक क्या सीखा?"
पहले राजा ने कहा-"मैंने यह सीखा कि मुझे कितने लोगों को सुधारना है!"
दूसरे राजा ने कहा-"मैंने यह सीखा कि राजकोष में कितने लोग नियमित चंदा देंगे।"
तीसरे राजा ने कहा-"मैंने यह सीखा कि हर फैसला जनता से पूछ कर करना बुद्धिमानी नहीं है।"
            

Sunday, May 18, 2014

मेरा नाम

बाजार में बहुत भीड़ थी।  कहीं तिल रखने की जगह नहीं।  लेकिन उस कॉलोनी में जाने का कोई और रास्ता भी तो नहीं था।  लिहाज़ा रेलम-पेल के बावजूद वहीँ से जाना था।  रास्ते में इतने सारे वाहन,इतने सारे लोग, तरह-तरह के कामों से आते- जाते, अलग-अलग समस्याओं के भंवर में घिरे।
मुझे यह सोच कर बेहद आश्चर्य हो रहा था कि हम में से किसी के पास जन्म लेते समय यह चॉइस नहीं होती कि  हम अपनी पसंद का देश- नगर, पसंद की जाति-धर्म,या पसंद के माता-पिता ही चुनलें, सब कुछ कितना अनिश्चित और स्वाभाविक-सहज होता है और फिर भी आते ही हम जोर-शोर से भिड़ जाते हैं, न जाने क्या करने में?
खैर, ऊटपटाँग सोचने का लाभ ये हुआ कि उनकी गली आ गई।  ढेर सारे ऊंचे-ऊंचे मकान, एक-एक मंज़िल पे दर्जनों घर।
फिर उनका घर भी आ गया, और ड्राइंगरूम में आमने-सामने मैं और वे भी।  बातें होने लगीं।
अब मैं बता दूँ, कि मैं इतनी उथल-पुथल को खंगालता हुआ उनके पास क्यों आया था? केवल इसलिए, कि इस महानगर में लाखों की भीड़ में सही और शुद्ध भाषा पर ध्यान देने वाले लोग इक्का-दुक्का ही थे।  कुछ दिन पहले ही शहर के एक लोकप्रिय टीवी चैनल ने ऐलान किया था कि वह अब दर्शकों की पसंद के लिहाज से नंबर एक बन गया है।  मैं उनसे यह अनुरोध करने गया था कि वे अब उस चैनल से सही-शुद्ध-सटीक भाषा लिखने- बोलने का आग्रह भी करें, क्योंकि वे वहां जाते रहते हैं।
सारी बात सुन कर वे बोले- "अजी, कौन ध्यान देता है,पिछले हफ्ते तो उन्होंने मेरा ही नाम गलत दिखा दिया था।"
उनकी बात में दम था।  लौटते समय मैं सोच रहा था कि जाने दो, यदि मेरा जन्म ही, स्पेन,केलिफोर्निया या डेनमार्क में हो जाता तो मैं क्या कर लेता?       
     

Saturday, May 17, 2014

बहुत आसानी से आएंगे अच्छे दिन

एक बार घूमते-घूमते एक संत एक गाँव में आ पहुंचे।  लोगों ने थोड़ी आवभगत की, और वह प्रसन्न हो गए।थे तो इंसान ही, पर कुछ सिद्धियाँ भी थीं।  उन्हीं के बल पर लोगों से बोले- "यदि कुछ मांगना चाहते हैं तो मांग लीजिये, कोशिश करूँगा कि आपको मिले।"
तत्काल कुछ उत्साही युवकों ने कहा- "ऐसा कुछ कीजिये कि हम सबके अच्छे दिन आ जाएँ।"
संत एकाएक गंभीर हो गए और बोले- "नहीं आएंगे !"
युवक अवाक रह गए।  आश्चर्य से बोले- "क्यों श्रीमान?"
संत ने कहा- "अच्छा, पहले ये बताइये कि अच्छे दिन आप किन्हें मानेंगे?"
युवकों ने अपने उद्गारों की झड़ी लगा दी- "हम सब संपन्न हों, हम सबको समय पर भोजन-कपड़ा-शिक्षा-आवास मिले,कोई बीमार न हो, अपराध न हों,कोई लड़ाई-झगड़ा न हो, व्यापार में मुनाफ़ा मिले, कहीं गंदगी न हो, हमारा मनोरंजन हो" आदि- आदि।
संत बोले- "यदि बैठे-बैठे भोजन चाहेंगे तो आपकी माता के अच्छे दिन नहीं आएंगे, आपको आवास और वस्त्र देने में आपके पिता के अच्छे दिन खो जाएंगे, कोई बीमार न हुआ तो डाक्टर-वैद्य-दवा बेचने वालों के अच्छे दिन नहीं आएंगे, अपराध न हुए तो पुलिस के अच्छे दिन नहीं आएंगे, लड़ाई-झगड़ा मिट गया तो वकीलों-न्यायाधीशों-प्रशासन के अच्छे दिन नहीं आएंगे, व्यापार में मुनाफ़ा मिला तो मंहगाई बढ़ने से गरीबों के अच्छे दिन नहीं आएंगे, कहीं गंदगी नहीं हुई तो सफ़ाई-कर्मियों को काम का संकट आएगा, आपको गहरी शिक्षा देने में आपके अध्यापकों के अच्छे दिन खप जायेंगे, यदि आपने नशे और छेड़छाड़ से मनोरंजन किया तो महिलाओं के अच्छे दिन नहीं आएंगे।"
युवक निराश हो गए, मायूसी से बोले- "तो क्या अच्छे दिन कभी नहीं आएंगे?"
संत ने कहा- "आ सकते हैं, केवल आपको अच्छे दिन की परिभाषा बदलनी होगी,आप अच्छे दिन उन्हें मानें  जिनमें आप कड़ी मेहनत करें, खुद से ज्यादा दूसरों का ध्यान रखें, कुछ पाने की जगह कुछ देकर खुश हों।"                      

Friday, May 16, 2014

ये दुनिया जिसने बनाई है, उस से बात करो

एक बार एक निर्जन टापू पर, एक हरे-भरे पेड़ पर एक बगुला कहीं से भटकता हुआ आ बैठा।  कुछ देर इधर-उधर देखने और व्यवस्थित हो लेने के बाद उसके जेहन में आया कि इस समय फुर्सत का आलम है, तबियत भी चाक-चौबस्त है, क्यों न कुछ सार्थक किया जाय।
उसने मन ही मन निश्चय किया कि वह आज अपने चारों ओर दिख रहे दृश्य की किसी भी एक समस्या को हल करेगा।  उसे अपना विचार उत्तम लगा और इस बात पर उसे गर्व हो आया।  
उसने बारीक़ी से चारों ओर देखना शुरू किया ताकि समस्याओं को चुन सके।  
उसने देखा कि पानी के किनारे की रेत में सूरज की तेज़ किरणें पड़ने से बार-बार बाहर झाँक रहे एक केकड़े को बड़ी पीड़ा हो रही है, और वह मिट्टी से बाहर नहीं आ पा रहा है।  
बगुले ने आलस्य छोड़ कर उड़ान भरी और केकड़े के ऊपर इस तरह मंडरा कर फड़फड़ाने लगा कि उस पर धूप न पड़े।सचमुच इसका असर हुआ, केकड़ा बाहर निकल कर रेत पर रेंगने लगा।
बगुले को प्रबल संतुष्टि हुई। उसके अंतर्मन से आवाज़ आई- " तुमने आज का अपने हिस्से का श्रम पूरा कर दिया है, अब तुम संसार से भोजन पाने के पात्र हो।"
बगुले ने एक भरपूर अंगड़ाई ली और झपट्टा मार कर केकड़े को खा गया।  
       
      

आइये आपको "इलेक्शन कार्निवाल की शॉपिंग" दिखाएँ

दस बातें, जो इस सवा महीने चले चुनाव ने सिखा दीं-
१. कुछ लोग इस देश को ऐसे देखते हैं, जैसे ये उन्हें उनके दादा-नाना ने खरीद कर दिया हुआ खिलौना हो, जिसे वे किसी और को छूने भी नहीं देंगे।
२. विनम्रता का स्थान राजनीति में पूरी तरह अक्खड़ता ने ले लिया है।
३. "व्यंग्य" अब साहित्य में नहीं, केवल राजनीति में ही बचा है।
४. जिस मंच पर जितना प्रगतिशील बोर्ड लगा है, उस पर उतने ही जड़ मस्तिष्क के लोग काबिज़ हैं।
५. ठहरे पानी को साफ करने के लिए बहते पानी में बदलने की कोशिश करने पर आप "अवसरवादी" कहलाते हैं।
६. जो आपको पुरस्कार या सम्मान देता है, आपको उसकी ही मिल्कियत समझा जाता है।
७. "कथनी" करने के लिए नहीं होती।
८. अपनी हरकतें तब बुरी लगती हैं यदि आपको कोई आइना दिखा दे।
९. बैंगन न खाने की सलाह दूसरों के लिए है।
१०.रस्सी जल जाती है पर उसका बल नहीं जाता।
                  

Wednesday, May 14, 2014

कोई यूँही नहीं लिखे गये हैं शास्त्र

लोग समझते हैं कि धनदेवी लक्ष्मी उसका साथ देती हैं जो उनके पीछे भागता है। पर ऐसा नहीं है,वे तो उसका साथ ज्यादा देती हैं जो उनसे दूर भागता है।
राजस्थान के भूतपूर्व मुख्यमंत्री अशोक गेहलोत को उनकी सादगी के कारण गाँधीवादी नेता कहा जाता है। कहते हैं, उन्हें धन से ज्यादा लगाव नहीं है।  यहाँ तक कि जब वह मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने सरकारी खज़ाना भी उदारता से बाँट दिया।  जनता को मुफ्त अन्न, बैठे-बैठे मजदूरी, तरह-तरह की पेंशन, मुफ्त दवाइयाँ और न जाने क्या-क्या मिला।
देवी लक्ष्मी से यह उदारता भला कैसे छिपी रहती?
अब खबर है कि उन्हें काँग्रेस का अखिल भारतीय कोषाध्यक्ष बनाया जा रहा है। अर्थात सारा कोष उनके हवाले!         

Tuesday, May 13, 2014

नयी सरकार दस काम करने के फेर में न पड़े , एक काम कर दे !

लोकतंत्र में सरकार सोचती है कि वोटर हमारा "अन्नदाता" है, तो इसके लिये कुछ किया जाय। और वह उसे मुफ्त में अन्न बाँटने लग जाती है।  
वह वोटर के लिये ऐसी महायोजनाएं बना डालती है कि वे जाएँ और खिड़की से पैसा लेलें।  यह बताना सरकार के प्रतिनिधि सरपंच का ज़िम्मा होता है कि ये पैसा किस काम का है।
सरकार अपनी खुद की सेहत के लिये वोटर को मुफ़्त दवा बांटती है और अपना इलाज विदेश में कराती है।  
इस तरह सरकार अपने वोटर की दशा मन्दिरोँ के बाहर बैठे उन भिखारियों जैसी बना देती है, जिन्हें आप कहें, -"बाबा खाना खालो", तो वे डकार लेकर कहते हैँ-"खाना खाने के सौ रूपये लगेंगे"
आप सहम कर रह जाते हैं।
तो अब ईश्वर देश को इतना काम करने वाली सरकार न दे।
सरकार केवल इतना करे कि इन्सान के पास मेहनत और ईमानदारी वाला एक "अनिवार्य" रोज़गार हो, और वह उस से अपना और अपने परिवार का पेट इज़्ज़त से पाल सके।     

Monday, May 12, 2014

ज़माने बीतते कहाँ हैं?

 जब कोई राजा अपने शौर्य को दुनिया के सामने लाने के लिये अश्वमेघ यज्ञ करता तो शूरवीर उसके घोड़े को  पकड़ने-रोकने के लिए इधर-उधर दौड़ा करते थे।  यदि अकेले कुछ न कर पाएं, तो एक-दूसरे की मदद लेने में भी गुरेज़ नहीं करते थे, चाहे हाथी-घोड़े-पैदलों को एक साथ ही क्यों न दौड़ना पड़े । उनके हाथ लहूलुहान हो  जाते, तो वाक़युद्ध शुरु हो जाता था।
मज़े की बात ये कि कोई कहता-"घोड़े को रोको, ये अपनी आंधी से सब तहस-नहस कर देगा," तो वहीँ कोई दूसरा कहता -"इस घोड़े की आँधी तो क्या,हवा तक नहीं है।"
यह सिलसिला तब तक चलता,जब तक राजा चक्रवर्ती सम्राट होकर महल में न आ जाता।  उसके बाद कुछ हाथ जुड़ जाते, कुछ मले जाते।  
          

Sunday, May 11, 2014

इंदिरा गाँधी भी यही चाहती थीं

बरसात का मौसम शुरु होने में कुछ ही  दिन बाकी थे।  खेतों में जोशो-ख़रोश से हल चल रहे थे।  संसारगंज गाँव के बूढ़े किसान रतन ने सुबह तड़के ही बुवाई कर देने का मन बनाया और एक पोटली में गेंहूँ के बीज रात को ही सँभाल कर अपने सिरहाने की दीवार के आले में रख छोङे ताक़ि सुबह-सुबह उन्हें लेकर निकल सके।
रात को सबके सोने के बाद छोटी बहू चुपचाप उठी।  उसने सोचा, पिताजी हर  बार गेंहूँ उगा लाते हैँ,मक्के की रोटी तो कभी खाने को ही नहीं मिलती, क्यों न पोटली में थोड़े मक्के के बीज मिला डालूँ। ऐसा करके वह चुपचाप जा सोई।
कुछ देर बाद बड़े बेटे की आँख खुली।  उसने सोचा, मेरी पत्नी की तबीयत ठीक नहीं रहती,डॉक्टर कहता है इसे जौ का आटा खिलाओ, यहाँ तो किसी को उसकी चिंता है नहीं, मुझे ही कुछ करना पड़ेगा। उसने मुट्ठी भर जौ पोटली में मिला दिये।
देर रात किसान की घरवाली की नींद खुली।  उसने सोचा, बिटिया साल में एक बार तो घर आती है, यहाँ भी उसे अपनी पसन्द का बाजरा कभी खाने को नहीँ मिलता। सोचते-सोचते उसने बीज की पोटली मेँ थोड़ा बाजरा बुरक दिया।
मौसम में जब फसल आई तो रतन का माथा ठनका। वह सब समझ गया, उसने मन ही मन ठान लिया कि अगले बरस जब वह बुवाई को आएगा तो बीज की पोटली को किसी को छूने भी नहीं देगा, उसे कलेजे से लगा कर सोयेगा।
रतन जैसी समझदारी बहुतों में होती है- इंदिराजी में भी थी, मोदीजी में भी।  
           

Saturday, May 10, 2014

सिलेबस-ए और सिलेबस-बी

कल कुछ युवा मुझसे पूछने लगे कि सत्र खत्म होते ही अब उन्हें अपना कैरियर चुनने की फ़िक्र होने लगी है। स्कूली पढ़ाई पूरी कर चुके ये बच्चे चाहते थे कि उन्हेँ "मीडिया" के बारे में संभावनाएं बताई जायँ।
वे रेडिओ पर मेरा इंटरव्यू सुन कर मेरे पास आये थे।
मैंने उनसे कहा कि उनकी छुट्टियाँ अभी-अभी शुरु हुईं हैं, इसलिए इन सब बातों पर सोचना जल्दबाज़ी है। उन्हें मैंने कुछ समय बाद आने के लिये कहा, साथ ही उन्हें छुट्टियों का आनंद लेने के लिये भी कहा।
दरअसल मैं उनसे कुछ कहने के पहले थोड़ा सोचना चाहता था।
वास्तव में "मीडिया"अब दो तरह का है।
एक में आपको किसी तैयारी क़ी ज़रूरत नहीं है, शोहरत,पैसे,काम आपको मिलते चले जाते हैं, बस काम पर जाते समय आपको "पंचतंत्र के बन्दर" की तरह "मगर" से मिलने जाते समय अपना कलेजा पेड़ पर टाँग कर जाना पड़ता है।
दूसरे सिलेबस में दुनिया भर की तैयारी चाहिए, उसकी बात हम तब करेँगे, जब बच्चे छुट्टियों से लौट आएं।               

"टू लेट"

खबर है कि दिल्ली में प्रधानमंत्री ने अपने बंगले में  पैकिंग शुरु करवा दी है। उन्हें मिले तोहफ़े और अन्य ज़रूरी सामान समेटा  जाने लगा है।
इतना ही नहीं,आज तो उन्होंने कुछ बड़े और महत्वपूर्ण विश्वनेताओं को अपनी विदाई के पत्र भी भेजने शुरु कर दिए जिनमें उनसे मिले सहयोग के लिये आभार जताया गया है।
वैसे ये समय प्रधानमंत्री के लिये घूम-घूम कर देश की जनता को ये बताने का था कि उन्होंने पिछ्ले दस सालों में देश के लिये क्या किया, कैसे किया, क्यों किया, और आगे उनकी पार्टी यदि सत्ता में आती है तो क्या करेगी।
लेकिन इसकी ज़रूरत उन्हें नहीं पड़ी क्योंकि देश की जनता उनसे न कुछ पूछ रही है और न उनसे कुछ जानना चाहती है।
जनता की दिलचस्पी तो उनकी जगह आने वाले से यह जानने की है कि उसके तरकश में कितने तीर हैं? और इसके लिए पूरे देश की जनता परीक्षक बन कर उसका कड़ा इम्तहान लेने में जुटी है।
सत्ताधारी पार्टी का कोई नेता न तो पैकिंग में मदद कराने प्रधान मंत्री के घर जा रहा है और न ही शिष्टाचार भेँट के लिये उधर का रुख़ कर रहा है। उलटे सत्ताधारी दल का शीर्ष नेतृत्व तो ऐसा जता रहा है,मानो उनका कोई किरायेदार घर ख़ाली कर रहा है और उन्हें नया किरायेदार ढूँढना है।
प्रधान मंत्री अगर रिज़र्व बैंक से रिटायर हुए होते तो कम से कम अफसरों की एक शानदार फेयरवेल पार्टी तो ज़रुर हुई होती।           

Friday, May 9, 2014

रखना है कहीं पाँव तो रखते हैँ कहीँ हम, आखिर तो एक इंसान [आम] हैं, फरिश्ता तो नहीं हम

हमारी संस्कृति की खासियत है कि हम मन ही मन जो चाहें, वो सबके सामने न कहें। बल्कि कुछ लोग तो इस रूढ़ि के इतने क़ायल हैं कि जो चाहें , बार-बार ठीक उसका उल्टा कहें।
हमारी फिल्मों ने भी हमें यही सिखाया है, कि जो कहा जाएगा, वह होगा नहीं।
जब कोई नायिका कहती है "तुम मुझसे दूर चले जाना ना" , इसका अर्थ है कि वह शीघ्र ही बिछड़ने वाली है।
जब वह नायक से पूछती है "तारीफ़ करोगे कब तक", और नायक कहता है "मेरे सीने में साँस रहेगी तब तक", तो इसका मतलब है कि फ़िल्म में इंटरवल के बाद दूसरी हीरोइन आने वाली है।
यदि नायक भाव-विभोर होकर कह रहा है "तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है" तो यकीन जानिये कि नायिका थोड़ी देर में अंधी होने वाली है।
यह मानसिकता हमारे देश के आम आदमी की भी है,शायद इसीलिए आम आदमी पार्टी का पदार्पण राजनीति में यही कहते हुए हुआ था कि वे न किसी से समर्थन लेंगे और न देँगे। फिर खुलेआम जो हुआ, वो सबने देखा। ये सिद्ध मंत्र और भी कई पार्टियोँ के नेता और नेत्रियां भी आजकल जप रहे हैं। ईश्वर उन्हें कम से कम तब तक तो अपनी बात पर कायम रहने की शक्ति प्रदान करे, जब तक वे खुद कुछ नया नहीं कह लेते।
वैसे हो सकता है कि किसी को किसी की ज़रुरत ही न पड़े।  

                     

Thursday, May 8, 2014

सबको कुर्सी नहीं चाहिए

भारतीय चुनावी परिद्रश्य देख कर कहा जा  रहा है कि यह घमासान "कुर्सी" के लिए है। लेकिन कुर्सी सबकी हसरत नहीं होती , क्योंकि कुर्सी जिम्मेदारी है, कुर्सी क्षमता है, कुर्सी जवाबदेही है।
अधिकांश उम्मीदवारों के पास न ये क्षमता है, न ये भावना।
यहाँ जिसे जो चाहिए, वह मिल जायेगा।  आइये देखें, किसे क्या चाहिए-
-कुछ लोग केवल इसलिए मैदान में हैँ कि इस उठने-बैठने से उन्हें कुछ पैसा मिल जाये।
-कुछ लोग इसलिए हैं कि उन्होंने कमा-कमा कर जो ढेर लगा लिया  है वह काम आ जाए।
-कुछ लोग इसलिए ताल ठोक रहे हैँ कि दूसरा कुर्सी पर बैठ कर काम करे, और हम उसपर छींटाकशी-नुक्ताचीनी करें।
-कुछ लोग चाहते हैं कि काम करने वाला मिल जाय, हम केवल "ताज" संभालें।
-कुछ इसलिए भी हैं कि मीडिया की सुर्खियों में थोड़े दिन आनंद लिया जाय।
-निस्संदेह,कुछ इसलिए हैं कि देश को जिस दिशा में ले जाना चाहते हैं उसके लिये सामर्थ्य मिले।              

वे स्टार्टिंग पॉइन्ट पर नहीं थे किन्तु अब विक्ट्री स्टैण्ड पर पहुँचते दिख रहे हैं।

कुछ लोगों में रंग बदलने की प्रवृत्ति बड़ी जबर्दस्त और स्वाभाविक होती है।  जैसे सब्ज़ियों में मिर्ची, जैसे फ़लों में  ख़रबूज़ा, जैसे जानवरों में गिरगिट, वैसे ही इंसानों में वे।
वैसे "बदलना" कोई नकारात्मक प्रवाह नहीं है। बल्कि इसके उलट ये ताज़गी, प्रगतिशीलता और नवोन्मेष का प्रतीक ही है।  यह वांछित भी है।  लाखों वैज्ञानिक, चिंतक, लेखक, कलाकार जीवन में बदलाव के लिये निरन्तर कार्यरत हैं, और उनकी उपलब्धि यही है कि उनके प्रामाणिक सिद्ध प्रयोग हमें बदलें।
लेकिन बदलाव में नकारात्मकता यही है कि हम अपने स्वार्थ के लिये बदलें।  यह अवसरवादिता है।  दूसरों की उपलब्धि को अपने खाते में डाल कर जो संतोष हम कमाते हैँ, वह नकारात्मक है।
केवल एक सप्ताह बाद हम ऐसे कई लोगों से मिलेंगे जो तालियों की गड़गड़ाहट के बीच दौड़ जीतने का लुत्फ़ उठा रहे होंगे, क्या हुआ जो वे अभी दौड़ नहीं रहे।         

Wednesday, May 7, 2014

और वह इतिहास में सच्चे जानवर के रूप में अमर हो गया

  एक शेर था।  एक दिन बैठे-बैठे उसे ये ख़्याल आया कि उसने हमेशा जंगल के प्राणियों को मार कर ही खाया है, कभी किसी का कुछ भला नहीं किया। इंसान हो या जानवर, कुछ भला काम करने की  इच्छा तो कभी-कभी जागती ही है।  अतः उसने भी सोचा कि अब से मैं केवल सत्य ही बोलूंगा।
सवाल ये था कि वह सत्य बोले तो कैसे बोले, क्योंकि उसके पास आने की हिम्मत तो किसी की थी नहीँ,वह खुद भी किसी के पास जाता तो उसे देखते ही सामने वाला जान बचा कर भाग जाता।
किन्तु अब तय कर लिया था तो सच भी बोलना ही था।
आख़िर उसे एक उपाय सूझ ही गया।  वह सुबह जब अपनी माँद से निकलता तो जोर से चिल्लाता कि मैं  आ रहा हूं,और जो भी मुझे राह में मिलेगा मैँ उसे मार कर खाऊँगा।
अब तो उसकी राह में कोई परिंदा भी कभी पर नहीँ मारता था। भूख से तड़पता हुआ वह थोड़े ही दिनों में मरणासन्न हो गया। उसे बेदम पड़े देख कर आसपास के जानवर उसकी मिज़ाज़पुर्सी को वहाँ आने लगे। वह उन्हें अपनी कहानी सुनाता कि कैसे उसने खुद अपना ये हाल किया।
आख़िर एक दिन एक नन्हे बटेर ने उससे पूछ ही लिया -"चाचा,सच बोलने की क़सम लेने से पहले तुम शिकार कैसे करते थे?"
शेर ने कहा-"मैं बिना कुछ बोले दबे पाँव शिकार पर झपटता था।"
बटेर ने हैरत से कहा-"तो फिर बोलने के चक्कर में पड़े ही क्यों? तुम झूठ बोलकर तो नहीं खा रहे थे !"
पर अब क्या हो सकता था, जब चिड़िया चुग गई खेत।                    

Tuesday, May 6, 2014

गलती हमारी ही है,

 हम सब बहुत सारे लोग थे, सब एक दूसरे के दोस्त।  हँसते थे, गाते थे, मिलते थे, खिलते थे।  एक दूसरे की सुनते थे, एक दूसरे  की कहते थे।
फिर चुनाव आया।  हम औरों की सुनने लगे।  कोई चिल्लाता था, कोई फुसफुसाता था, कोई  गरजता था, कोई  बरसता था, कोई आग उगलता था, तो कोई बर्फ गिराता था।
बैठ गए हम सब, अपना -अपना  दूध का कटोरा लेकर  नींबू के पेड़ के नीचे !
अब हम सेक्युलर हैं, सांप्रदायिक हैँ, सवर्ण हैं, दलित हैँ, पिछड़े हैँ,उदार हैं, प्रगतिशील हैं, दकियानूसी हैँ, खुद्दार हैँ, चापलूस हैं.
औरों से मत पूछिये, हम हैँ कौन जनाब ?
अपने मन से कीजिये,अपने जन्म-हिसाब!  
  

Monday, May 5, 2014

लहरें

लहरें, हिलोरें, जलजले, झंझावात, सब होते हैं. आप इन्हें देखें, न देखें, ये होते हैं.
जब सागर तट पर लोगों का हुजूम हो, लहरें तब भी होती हैं. भिनसारे या देर रात जब नीरव निशब्द सागर तट पर कोई भी नहीं होता, मछुआरे तक नहीं, लहरें तब भी होती हैं. ज्वार में, भाटे में, कम या ज्यादा, किन्तु लहरें होती हैं.
लहरें पानी को साफ़ करती हैं. लहरें सन्नाटे तोड़ती हैं. लहरें जम गई काई या मिट्टी को हटाकर तलों को एकसार करती हैं. लहरें मल्लाहों को पसीने ला देती हैं.लहरें ठहरे पानी में मलाल भरती हैं.लहरें बहते पानी में जलाल भरती हैं. लहरें बरसते पानी में थिरकन जगाती हैं.
लहरें जनमानस के ह्रदय-दालान में अंतःक्षेप करके तुलसी के खुशबूदार बिरवे रोपती हैं.
लहरें जनजीवन के मस्तिष्क-आलोड़न से नागफ़नियों के फ़न कुचल देती हैं.
इनके विध्वंसक, इनके नियामक, इनके सृजनकारी आयामों को निहारने का अपना अलग ही मज़ा है.
आइये, इनकी राह देखें !                      

Saturday, May 3, 2014

ये बात तो काफी पुरानी है,अब तो और भी नस्लें होती होंगी?

   किसी विद्वान ने इतिहास में हुए राजाओं को भ्रष्टाचार से निपटने के उनके तरीके के आधार पर चार किस्मों में बाँट दिया.
पहली किस्म उन राजाओं की थी जो न तो स्वयं भ्रष्टाचार करते थे और न ही किसी और को ऐसा करने देते थे.
दूसरी श्रेणी उन राजाओं से बनी,जो जनता का भ्रष्ट होना तो स्वीकार कर लेते थे, पर स्वयं किसी तरह का भ्रष्टाचार नहीं करते थे.
तीसरी जमात में वे राजा आते थे जो थोड़े बहुत भ्रष्टाचार को बुरा नहीं समझते थे, वे खुद भी इसमें लिप्त हो जाते थे और प्रजा को भी इसकी अनुमति दे देते थे.
चौथा वर्ग उन दबंग राजाओं का था जो जनता का भ्रष्टाचारी होना कतई बर्दाश्त नहीं करते थे,और जो कुछ हेरा-फेरी या भ्रष्टाचार करना हो, उसे स्वयं ही सम्पादित करते थे.
इन गुणों के आधार पर ही इन राजाओं के शासन की अवधि भी निर्धारित होती थी.
पहली श्रेणी के राजाओं के राज का सूरज जम कर चमकता था किन्तु जल्दी ही अस्त हो जाता था.
दूसरी किस्म के राजाओं के राज की नैय्या डगमगाती रहती थी और जल्दी ही डूब भी जाती थी.
तीसरी प्रकार के राजा अपना शासन लम्बे समय तक खींच ले जाते थे.
चौथी प्रकार के राजा सिंहासन से कभी नहीं हटते थे, वे पदार्थ की भांति अवस्था बदल कर,बहरूपियों की भांति रूप बदल कर, पवन की तरह दिशा बदल कर, अथवा जल की नाईं तल बदल कर किसी न किसी भांति सत्ता में बने रहते थे.
भारतीय रंगमंच के ग्रीनरूम में इस समय ऐसे कई राजा चोले बदलने में व्यस्त हैं.अपनी तेरहवीं पर, क्षमा कीजिये,आज से तेरह दिन बाद,वे नए अवतार में, नए चोले में पुनर्जन्म पा फिर राजयोग भोगेंगे।                     

सेज गगन में चाँद की [24]

कुछ झिझकती सकुचाती धरा कोठरी में दबे पाँव घूम कर यहाँ-वहां रखे सामान को देखने लगी। उसकी नज़र सोते हुए नीलाम्बर पर ठहर नहीं पा रही थी। उसके ...

Lokpriy ...